Thursday, 19 June 2014

अन्नंत यात्रा के पथिक



अन्नंत यात्रा के  पथिक
      मेरी कहानी और हेडिंग  में क्या तारतम्य हे, पता नहीं, कुछ लिखने की  इच्छा  वर्षो से थी, अब वायुसेना से रिटायर होकर समय की मेहरबानी से सुरु किया हूँ. क्या लिखू बहुत से विचार कहानियाँ, जीवन की अनगिनत घटनाएँ  सब गड-मड्ड  सी हो रही है. सोचा अन्नंत यात्रा में स्वयं एक पथिक हूँ , तो इसी से सुरु करूँ . मेरी इस कहानी की सुरुआत मेरी  उम्र के 4 वे वर्ष से सुरु होगी. ज्यादातर  शुरुआत  बचपन से होती है, मुझे तो जीवन के मध्य या थोडा  आगे से ही सुरु करनी पड़ी है. इसके पहले के वर्ष कैसे  वक्त की सर्दी- गर्मी में बह  गये, पता ही नही चला. बात 2002 की है, नागपुर में कार्यरत  था, जीवन ठीक-ठाक गुजर रहा था. इस वर्ष मेरे साथ कई दुर्घटनाएं   हुई,  मरते- मरते बचता रहा.किस की कृपा से पता नही. शायद भाग्य या ऊपर वाले की मेहेरबानी.
         फ़रवरी २००२ में, कार्डियो  थिरेपी सेंटर पूना  भेजा गया. क्योंकि   ऐसा कामठी  में डाक्टरो    को लगा की, मुझे ह्रदय  रोग हो सकता हे मेरे पांव एवं   हाथ रोबोटिक जैसे हो गए थे. ठीक से हाथ उठाना एव पांव से सही तरह से चलना मुश्किल था(Shoulder and leg frozen).पहले कामठी के अस्पताल से और फिर अश्विनी हॉस्पिटल  बॉम्बे और बाद में CTC  पुणे भेजा गया, एसा इसलिय हुआ क्यूंकि बीमारी का पता नही लग  रहा था.डाक्टरों की निरंतर जाच पड़ताल चल रही थी, कुछ भी पता नही  लग रहा था.  चलना  फिरना मुश्किल, बाथरूम जाना समस्या, करें तो  क्या करे. में पुस्तको का प्रेमी वो भी नही मिल पा रही  थी, क्योकि मेरा कमरा दूसरी मंजिल पर था एवं पुसतकालय ग्राउंड फ्लोर पर. लिफ्ट थी नही सीढ़ियो से चलना ऊपर नीचे  आना पहाड़ सी मुस्किल थी. बगल के कमरे में  नेवी के कमांडर वेद  प्रकाश थे जो  हार्ट ओप्रेशॉन के बाद रिविव के लिए  आये  थे. वे पुस्तको की दुनिया में खोये रहते  थे. बीच बीच  में हमारी उनसे इधर उधर की बात हो जाती.
      अब तक मैं  काफी बोर हो गया था. अकेलेपन में रहते-रहते उनके पास गया ओर कुछ पढ़ने  को माँगा. हंस  कर बोले तुम्हरे काम की पुस्तकें  मेरे पास नही है. मेने देखा उनके सिरहाने कई पुस्तके थी, मैंने पूंछा   क्या वे किताबे किसी कोर्स  की हैं. बोले तुम्हे पसंद नही आयगी, विनती की कोई बात नही. मैंने गुजारिश किया  एक दे दो, यदि नही समझ पाया तो वापस कर दूंगा. मान गए और   एक छोटी सी पुस्तिका पकडा कर कहा की  इसे पढो यदि एक समझ पाए तो और भी दूंगा. तथास्तु  कह कर ले लिया. एक बार पढ़ने  पर वास्तव  में कुछ समझ नही आया; लगा की गुरु एवं शिष्य की प्रस्नोत्रि है. दुबारा मन कड़ा करके पढ़ा तो पाया ध्यान की विधि के बारे में कहा गया हे. फिर पढ़ा ध्यान कैसे   क़रना है.


      इससे क्या होगा काम तो कुछ था नही,  हर कुछ घंटे में BP  की जांच  खून आदि  का टेस्ट, 24 घंटे निरापद खाली, मरता  क्या न करता; सोचा  ध्यान में ही कुछ समय निकाला  जाये. गुरु एवं प्रेसप्टर का आभाव ध्यान कैसे  करूँमन ने कहा सब साथ ही है  शुरू तो करो. कमरे को पर्दे से दो भाग में अलग किया  गया था, आगे की तरफ चरपाई  और पीछे की तरफ दो आराम कुर्सी एवं एक छोटी मेज. जगह काफी थी, एव समय भी प्रचुर मात्रा में साथ था. किताब को  पढ़कर जो विधि बताया गया  था उसके अनुसार ध्यान का प्रथम अध्याय 4वे  साल में शुरू  हो गया.जब ध्यान शुरू  किया तो  शरीर में दर्द रहता था, ऐसा नही था के सहन न कर सकूँ. चलना- फिरना सब धीरे- धीरे, इस एहसास के साथ  की दिल की बीमारी हो सकती हैं,काफी कठिन समय था. एक घंटा बैठना संभव नही था; जितना भी समय  बैठा जा सकता हें, बैठना सुरु  किया. सुबह ध्यान, सायंकाल सफाई और सोते समय प्रार्थना; यह सब  जारी रहा. तीसरे दिन लगा सेहत में कुछ सुधार हो रहा है.
  चलना थोड़ा आसान सा लगा; शरीर एवं घुटनो का दर्द, कम हो गया था. करीब 15 दिन अस्पताल में रहते  हो गए थे. सिर्फ कई प्रकार की जांच  पड़ताल ही चल रही थी, नागपुर और पुणे अस्पताल के बीच लगभग एक महीना हो गया था. किसी तरह की दवा नही दी जा रही थी क्यूंकि बीमारी का पता ही नहीं लग रहा था. आखिर में डाक्टरों की राय बनी की मेरी  सोच की वजह से बीमारी हैं. मानता हूँ कुछ हद तक ठीक थे वे लोग. बिमारी का पता नही चल पा रहा था, एक गोली सेब्रिट्रेट की जेब में रखी थी, जिसका इस्तेमाल सीने में दर्द होने पर ही करना था.  अब शरीर;  धीरे-धीरे ध्यान एव  सफाई की प्रक्रिया  के द्वारा स्वत: ठीक होने लगा था. इसी बीच एक रात करीब एक बजे  डॉक्टर आये और बोले  आपका अभी चेक अप  करना हे. मै काफी घबरा गया था. डॉक्टर बोले घबराओ नहीं,  दिन में तो समय नही मिल पाता, अभी फुर्सत में Echo Test  करते है. मैने कहा मै तो ठीक से चल नही पाता, बोले कोई  बात नही अटेंडेंट को बुलाया और कहा साहब को व्हील चेयर पर ले आइये.
  
      उस समय मन की स्थिती क्या थी बताना जरा कठिन है;  घबराहट  में भरा था,  100 गज  की दूरी रात में 100  किलोमीटर  की  लगी.  मन में  अनरगल प्रलाप जारी था.  विचारो के बवंडर से लड़ता-झगड़ता आखिर कार डॉक्टर  के सामने हाजिर हो गया. कमरे में कई मशीने लगी थी. और रोशनी से चकाचक सब कुछ चमक    रहा था. घड़ी की टिकटिक की आवाज जादा तेज होकर सुनाई पड़ रही थी. डॉक्टर ने कहा बेड पर लेट जावो, में  शर्ट उतार कर लेट गया. बताया गया इकोग्राफी मशीन है. इसे मै भी देख सकता हूँ . टेस्ट सुरु हुआ तो डॉक्टर बताने लगे, देखिए आपकी सभी  रक्त प्रवाह नलिकाएं निरंतर   जारी है. कही भी रुकावट नही दिख रही है, उसी  बीच मै बोल बैठातो डॉक्टर फिर सीने और बाएं हाथ में दर्द क्यों बना रहता हैं.

   उन्होंने कहा रुको फ़िर दिल के आसपास जाच फिर शुरु कर दिया , बाद मे बोले आपको आकस्मिक अटैक (Sudden Attack) की बीमारी हैं. इसमें आपकी गहन सोच की वजह से ह्रदय एकाएक बंद हो सकता हैं; और इसका  कोइ इलाज नही हैं. ऐसी बीमारी शायद लाखो में एक आध  में ही होती हैं, पर घबराने की कोई बात नही, कल सुबह 10 बजे आपका इन्जियोग्राफी करके बात साफ कर देते हैं. मुझे लगा बात शायद काफी नाजुक हो गई हैं, मेने कहा यदि जरूरी नही तो क्यो किया जाय  एन्गिओग्राफ़ी. डॉक्टर बोले की मन से ह्रदय रोग का भ्रम  निकल जाय यह जरूरी हैं. मन सन्नाटे  में आगया  पूरी रात ठीक से सो नही पाया, एक अंजान सा डर सताता रहा, क्या दिल की बिमारी सचमुच है.
     सुबह जल्दी उठ गया, ध्यान  किया फिर कुछ लोगो से पता  किया, तो बताया गया  जादा गंभीर बात  नही हैं. एक छोटे से आप्रेसन  द्वारा  ह्रदय की रक्त कोशिकाओ कि जाच की जाती है उससे पता चलता हैं की ख़ून कहीं  अवरुद्ध तो नही हैं. खैर  हिम्मत करके; एक अनजान गुरु, अपरिचित साधना को मन में साधे आप्रेसन थिअटर  वाले कमरे के वेटिंग रूम  में तीन और लोगो के साथ बीठाया गया. एक समय जीवन में एसा भी था, जब मंदिर,मस्जिद और गुरु परंपरा से न कोई नाता था और न किसी प्रकार का वास्ता. फिर उन्हें एक-एक कर स्ट्रेचर पर लेटे हुए बाहर वार्ड की तरफ जाते हुए देखता रहा. नर्स से पूछा तो उसने कहा तीनो के ह्रदय में कुछ न कुछ रुकावट हैं. बस अपना तो दिल वही अंजान से डर में बैठ गया.
      अब हमारी बारी आइ तो घबराते हुए अंदर गया एवं आप्रेसन टेबल  पर लिटाया गया. गर्मी के दिन थे, चार एयर कंडिशनर   कमरे को  ठंडा कर रहे थे.  मेरी तो कंप-कम्पी छूट  गई. डॉक्टर ने पूंछा; क्या भाई डर लग रहा है. मैंने कहा नहीं. परन्तु वो तो मेरे मन के डरने की बात समझ ही गए. नर्स से कम्बल लाने को कहा, वो तुरंत  दो- तीन कम्बल लेकर आई और मुझे ढँक  दिया . डॉक्टर बोले हम चाय  पी कर आते हैं, तब तक तुम्हारा शरीर गर्म हो जायगा. आज बहुत सिद्दत  से अनजाने गुरु एवं परम प्रभु को याद किया, इससे पहले मन्दिर जाने से हमेशा कतराया करता था; पत्नी  धक्का मार कर  कहती, आज जनम अष्टमी हैं, आज तो चलो मंदिर , तो मैं उनकी बात  को कभी नकार नहीं सका, और मन्दिर के बाहर जाकर खड़ा रहता. एक बार मन्दिर के अंदर जाकर प्रणाम करता, बस काम ख़तम. वास्तविकता यह थी की मंदिर की भीड़ और पूजा के हंगामे से घबराहट सी होती थी. कभी लगा ही नहीं की भगवान् जी अपना डेरा मंदिरों में बसे हुए रहते है. मुझे तो बताया गया था कि प्रभु तो कण-कण में व्याप्त है और इंसान के दिल में निवास करते है. सोचता था की उनकी तलास में मंदिर क्यूँ जाऊ.

     खैर डॉक्टर आये और बोले बिल्कुल चिंता मत करो ,जो कुछ होगा तुम स्वयं उसके साक्षी होगे. एक छोटा सा इंजेक्शन लगाता हूँ  बस सब ठीक हो जायगा .उन्होंने दाहिनी जांघ पर मुख्य रक्त संवाहिका नाली में  पंक्चर करके कुछ नीला प्रदार्थ डाला और मानिटर पर मुझे दिखा कर बोले तुम्हारी सारी ह्रदय कोशिकाएं बिल्कुल निर्बाध रूप से काम कर रही है, सब ठीक देखकर अच्छा लगा और डॉक्टर को अनेक धन्यवाद दिया. इसके  कुछ दिन बाद मुझे अस्पताल से  छुट्टी  मिल गई. अब मानसिक और कुछ हद तक शारीरिक रूप  से पूरी  तरह स्वस्थ होकर नागपुर चला आया. धीरे धीरे बिना दवा के मै एक महीने में ठीक हो गया. ध्यान की प्रक्रिया निरंतर जारी रही.

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